लेखक की डायरी • 29 सितम्बर 2026

ख़ुद किताब प्रकाशित करना: पूरा रास्ता

ख़ुद किताब प्रकाशित करना: पूरा रास्ता

पांडुलिपि तैयार है। अब दो रास्ते हैं — प्रकाशक को भेजना, या ख़ुद छपवाना। दोनों जायज़ हैं, पर दोनों की तैयारी अलग है, और ग़लत रास्ते पर ग़लत फ़ाइल लेकर चलने में महीने निकल जाते हैं।

नीचे दोनों रास्तों के असली क़दम हैं: प्रकाशक को क्या भेजा जाता है, ख़ुद छपवाने में क्या-क्या करना पड़ता है, ISBN कहाँ से मिलता है और क़ीमत कैसे तय होती है।

कौन-सा रास्ता आपके लिए है

प्रकाशक संपादन, वितरण और दुकानों में जगह देता है; बदले में समय लेता है और कुछ फ़ैसले अपने हाथ में रखता है। ख़ुद छपवाना तेज़ है और नियंत्रण आपके पास रहता है; बदले में संपादन, आवरण, वितरण और प्रचार — सब आपके ज़िम्मे आ जाता है।

जो प्रकाशक आपसे पैसे माँगे, वह प्रकाशक नहीं है। छपाई का ख़र्च लेखक से लेकर "साझा प्रकाशन" कहने वाले अनुबंधों में वितरण अक्सर काग़ज़ पर ही रह जाता है; उतने ही पैसे में ख़ुद छपवाकर अधिकार अपने पास रखना बेहतर सौदा है।

फ़ैसला करते समय सवाल एक ही है: क्या इस किताब को दुकान की अलमारी में होना ज़रूरी है, या अपने पाठक तक ऑनलाइन पहुँच जाना काफ़ी है?

ख़ुद छपवाना है तो: क्रम से क़दम

1

संपादन और प्रूफ़

छोड़ देने पर यही क़दम सबसे महँगा पड़ता है: अशुद्धियों से भरी किताब पर पहली समीक्षा अशुद्धियों की ही होती है और वह स्थायी रहती है। अंतिम प्रूफ़ किसी और से कराइए — अपने ही लिखे में आँख ग़लती अपने आप ठीक कर लेती है।

2

ISBN

भारत में ISBN शिक्षा मंत्रालय के राजा राममोहन राय राष्ट्रीय एजेंसी के पोर्टल से निःशुल्क मिलता है, और आप अपने नाम से प्रकाशक के रूप में पंजीकरण करा सकते हैं। छपाई से पहले यह काम निपटा लीजिए, बाद में नहीं।

3

पृष्ठ-सज्जा और आवरण

भीतरी पन्ने प्रेस के माप के अनुसार, कटाई का हाशिया और भीतर की जगह जोड़कर PDF में तैयार होते हैं। देवनागरी में फ़ॉन्ट का चुनाव ख़ास ध्यान माँगता है — मात्राएँ और संयुक्ताक्षर हर फ़ॉन्ट में ठीक नहीं बैठते। आवरण की एक ही कसौटी है: छोटे आकार में, फ़ोन की स्क्रीन पर पढ़ा जा रहा है या नहीं।

4

छपाई का तरीक़ा

माँग पर छपाई में कोई अग्रिम भंडार नहीं रखना पड़ता, इसलिए पहली किताब के लिए वही समझदारी है। ऑफ़सेट तभी सस्ता पड़ता है जब संख्या बड़ी हो — और बिना बिकी किताबें घर में रखनी पड़ती हैं।

5

बिक्री के रास्ते

ऑनलाइन दुकानें, ई-पुस्तक मंच और आपका अपना पन्ना। डिजिटल संस्करण को हल्के में मत लीजिए: उसकी लागत लगभग शून्य है और छपी किताब जिन पाठकों तक नहीं पहुँचती, उन तक पहुँचने का यही एकमात्र रास्ता है।

प्रकाशक को भेजना है तो

भेजी गई ज़्यादातर पांडुलिपियाँ पहले पन्ने पर ही छँट जाती हैं। न छँटने का रास्ता यही है कि माँगा गया प्रारूप अक्षरशः दिया जाए — पढ़े जाने की संभावना बढ़ाने वाला यह सबसे सस्ता काम है।

अलमारी में सजी किताबें
हर प्रकाशक की अपनी सूची होती है; पांडुलिपि उसी के हिसाब से भेजिए।

पांडुलिपि पूरी हो। उपन्यास के मामले में अधूरी फ़ाइल नहीं भेजी जाती। अधूरा मसौदा यह सवाल खुला छोड़ देता है कि लेखक किताब पूरी कर भी पाएगा या नहीं।

सारांश एक पन्ने का, अंत समेत। यह विज्ञापन नहीं, घटनाओं का सार होता है; अंत छिपाने से कौतूहल नहीं बनता, फ़ाइल का मूल्यांकन ही असंभव हो जाता है।

सही प्रकाशक चुनिए। जिसकी सूची में आपकी तरह की किताब है ही नहीं, वहाँ अच्छी पांडुलिपि भी लौट आती है। पाँच सही पते पचास बेतरतीब पतों से बेहतर हैं।

क़ीमत और उम्मीद

क़ीमत उतने ही पन्नों वाली किताबों को देखकर तय कीजिए। बहुत कम दाम गुणवत्ता पर शक पैदा करता है और बहुत ज़्यादा दाम पहली किताब के पाठक को रोक देता है।

ऑनलाइन दुकानों का कमीशन और भाड़ा जोड़कर देखिए; हाथ में आने वाली रक़म अक्सर छपे दाम की आधी के आसपास होती है।

पहली किताब से बिक्री की उम्मीद कम रखिए। किताबें प्रचार से नहीं, समय और अगली किताब से बढ़ती हैं।

पांडुलिपि अभी तैयार न हो तो पहले वहीं लौटिए: उपन्यास कैसे लिखें और हिंदी गद्य की शैली — प्रकाशन से पहले के दो क़दम यही हैं।

पांडुलिपि भेजने लायक़ हालत में रखिए

Writer Atlas एक ही पांडुलिपि से DOCX, PDF और EPUB निकाल देता है — प्रकाशक को Word चाहिए, प्रेस को PDF, डिजिटल बिक्री को EPUB, और तीनों एक ही पाठ से बनते हैं। संस्करणों का इतिहास रहता है, इसलिए हटाया गया अध्याय ज्यों का त्यों वापस आ जाता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

ISBN लेना ज़रूरी है?

बिक्री के लिए आने वाली हर किताब के लिए ज़रूरी है; ISBN के बिना किताब वितरण और ऑनलाइन बिक्री के रास्तों में नहीं जा पाती। भारत में यह राजा राममोहन राय राष्ट्रीय एजेंसी के पोर्टल से निःशुल्क मिलता है।

माँग पर छपाई और ऑफ़सेट में क्या चुनें?

पहली किताब के लिए माँग पर छपाई, क्योंकि उसमें अग्रिम भंडार नहीं रखना पड़ता। ऑफ़सेट तभी सस्ता पड़ता है जब संख्या बड़ी हो, और बिना बिकी प्रतियाँ आपके ही घर में रह जाती हैं।

जो प्रकाशक छपाई का ख़र्च माँगे?

वह प्रकाशन सेवा है, प्रकाशक नहीं। ऐसे अनुबंधों में वितरण अक्सर काग़ज़ पर रह जाता है। उतने ही पैसे में ख़ुद छपवाइए, अधिकार अपने पास रखिए और बिक्री का हिसाब सीधे देखिए।

प्रकाशक कितने समय में जवाब देते हैं?

तीन महीने से एक साल तक, और अक्सर जवाब आता ही नहीं। इसीलिए पांडुलिपि एक साथ कई जगह भेजी जाती है; इंतज़ार के दौरान अगली किताब शुरू कर देना सबसे स्वस्थ तरीक़ा है।

क्या ई-पुस्तक छपी किताब की बिक्री घटाती है?

व्यवहार में नहीं। दोनों संस्करण अलग पाठकों तक जाते हैं और ई-पुस्तक अक्सर नए पाठक जोड़ती है। लागत लगभग शून्य होने के कारण उसे छपी किताब के साथ ही निकालना समझदारी है।

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