अधूरे छूटे उपन्यास लगभग हमेशा एक ही जगह रुकते हैं — वहाँ, जहाँ शुरुआत का जोश ख़त्म हो चुका होता है और अंत अभी बहुत दूर दिखता है। उस बिंदु पर लेखक के पास एक शुरुआत होती है, रास्ता नहीं।
कमी प्रतिभा की नहीं, तैयारी की दिशा की है। दृश्य-दर-दृश्य बनाई गई विस्तृत रूपरेखा पहली ही अप्रत्याशित मोड़ पर ढह जाती है। अंत तक टिकती है वह योजना जो दृश्य नहीं, कुछ निर्णय तय करती है।
विस्तृत रूपरेखा क्यों टूट जाती है
चालीस दृश्यों की सूची उस उपन्यास की सूची है जिसे आप लिखने से पहले ही जानते हैं। लेकिन पात्र लिखते-लिखते बदलते हैं। पंद्रहवें दृश्य में कोई अप्रत्याशित निर्णय ले ले, तो आगे के पच्चीस दृश्य एक साथ बेमानी हो जाते हैं।
योजना का काम दृश्यों को पहले से लिख देना नहीं है, बल्कि लिखते समय यह बताना है कि कौन-सा दृश्य इस किताब का है और कौन-सा नहीं। इसके लिए सूची नहीं, कुछ स्थिर निर्णय चाहिए — जब उपन्यास बिखरने लगे तो लौटने की ज़मीन वही होती है।
नीचे दिए पाँच निर्णय कुछ पन्नों में आ जाते हैं और पहले मसौदे भर अपरिवर्तित रहते हैं। दृश्य बदलते हैं, निर्णय टिके रहते हैं।
लिखने से पहले के पाँच निर्णय
किसकी कहानी है
अंत में बदला हुआ कौन है। यह ज़रूरी नहीं कि वही पात्र हो जिसके हिस्से सबसे ज़्यादा पन्ने आए हों। यह तय न हो तो बीच में कथा अपने आप किसी सहायक पात्र की ओर खिसक जाती है और एक किताब में दो उपन्यास बस जाते हैं।
वह क्या चाहता है, रोकता कौन है
चाहत ठोस होनी चाहिए — कोई चिट्ठी वापस पाना, कोई क़र्ज़ चुकाना, किसी शहर लौटना। अमूर्त चाहतें दृश्य नहीं बनातीं। रोकने वाली कोई परिस्थिति नहीं, कोई व्यक्ति हो तो बेहतर है, क्योंकि व्यक्ति के सामने खड़ी चाहत अगला दृश्य ख़ुद पैदा करती रहती है।
आख़िरी दृश्य
अंत जान लेने से कौतूहल नहीं मरता, दिशा मिलती है। एक वाक्य काफ़ी है: कौन, कहाँ, क्या समझ चुका। रास्ते में यह वाक्य बदल सकता है, पर जब तक नहीं बदलता, हर दृश्य को उसी से नापा जा सकता है।
कथावाचक और काल
उत्तम पुरुष या अन्य पुरुष; भूतकाल या वर्तमान। सौ पन्ने लिखने के बाद यह बदला तो सौ पन्ने दोबारा लिखने होंगे। तय न कर पा रहे हों तो एक ही दृश्य दोनों तरह से लिखें और वह चुनें जिसमें कम सफ़ाई देनी पड़ी।
किताब का नाप
कितने अध्याय, हर अध्याय में लगभग कितने शब्द। यह लक्ष्य नहीं, पैमाना है: यह बताता है कि आप आज कहाँ हैं और कितना बचा है। बिना पैमाने की किताब हर दिन उतनी ही दूर दिखती है, और यही छोड़ देने का सबसे आम कारण है।
फिर भी जब क़लम रुक जाए
पाँच निर्णय अटकना ख़त्म नहीं करते, बस कारण पहचानना आसान बना देते हैं। रुकने की वजह लगभग हमेशा तीन में से एक होती है और तीनों का इलाज अलग है।
दृश्य आपको पता नहीं है। अगर आप नहीं बता सकते कि पात्र इस क्षण क्या चाहता है, तो दृश्य लिखा नहीं जाएगा। तीन पंक्तियों में चाहत और अड़चन लिख दीजिए, दृश्य अपने आप खुल जाएगा।
यह दृश्य ही ग़लत है। कई बार अटकना यही कह रहा होता है कि इस दृश्य की किताब में जगह नहीं। उसे छोड़कर अगला लिखिए; लौटकर देखने पर अक्सर बीच में कोई खाली जगह मिलती ही नहीं।
पिछला कोई निर्णय ग़लत है। अगर किताब हर जगह भारी लग रही है तो गड़बड़ आमतौर पर तीस पन्ने पीछे है। पाँच निर्णय दोबारा पढ़िए — बदलना दृश्य को नहीं, उनमें से किसी एक को है।
रोज़ का ढर्रा, प्रेरणा से पहले
एक ही समय, एक ही जगह। दिमाग़ सन्दर्भ समय और जगह से याद रखता है; बदलती दिनचर्या में हर दिन दोबारा गरम होना पड़ता है।
वाक्य बीच में छोड़कर उठिए। अगले दिन ख़ाली पन्ना नहीं, अधूरी पंक्ति मिलती है और शुरू करने की क़ीमत शून्य हो जाती है।
पहले मसौदे में पीछे लौटकर सुधार मत कीजिए। सुधार अलग काम है और साथ करने पर लिखने की रफ़्तार इतनी गिरती है कि लिखना ही छूट जाता है।
भाषा कसने की बात हिंदी गद्य की शैली में है, और मसौदा पूरा हो जाने के बाद का रास्ता ख़ुद किताब प्रकाशित करने में।
निर्णय एक ही जगह रखिए
Writer Atlas में ये पाँच निर्णय किताब के भीतर एक पन्ने के रूप में रहते हैं। अध्याय बाईं ओर के क्रम में खींचकर बदले जा सकते हैं, पात्र अलग से दर्ज होते हैं और खोज पूरी किताब में चलती है। ब्राउज़र, डेस्कटॉप या फ़ोन — जहाँ से भी खोलें, वही मसौदा वहीं से आगे बढ़ता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
एक उपन्यास कितने शब्दों का होना चाहिए?
हिंदी में अधिकतर उपन्यास साठ हज़ार से एक लाख शब्दों के बीच होते हैं। यह नियम नहीं, एक दायरा है; पहली किताब में निचली सीमा के पास रहना उसे पूरा करने और प्रकाशक तक पहुँचाने, दोनों को आसान बनाता है।
क्या बिना योजना के लिखा जा सकता है?
लिखा जा सकता है, पर क़ीमत संशोधन में चुकानी पड़ती है — बिना योजना का पहला मसौदा आमतौर पर ढाँचे से दोबारा खड़ा करना पड़ता है। पाँच निर्णय लिखने की आज़ादी घटाए बिना यह क़ीमत काफ़ी कम कर देते हैं।
अध्याय कितने लंबे हों?
अध्यायों की संख्या से ज़्यादा उनकी लंबाई मायने रखती है: जितना पाठक एक बैठक में पढ़ सके, यानी लगभग पंद्रह सौ से तीन हज़ार शब्द। कुल लंबाई को इसी से भाग देने पर अध्यायों की संख्या अपने आप निकल आती है।
पहला मसौदा कितने समय में पूरा हो?
रोज़ पाँच सौ शब्द, हफ़्ते में पाँच दिन — छह महीने में लगभग साठ हज़ार शब्द। अवधि से ज़्यादा निरंतरता मायने रखती है; दो हफ़्ते का अंतराल उस जगह का पूरा सन्दर्भ मिटा देता है जहाँ आपने छोड़ा था।
क्या कृत्रिम बुद्धिमत्ता उपन्यास लिख सकती है?
आपके लिखे को पढ़कर विरोधाभास, दोहराव और कमज़ोर दृश्य पकड़ने में वह काम की है, और मसौदे के वाक्य भी सुझा देती है। पर किसकी कहानी है और कैसे ख़त्म होती है, यह आपका निर्णय है — क्योंकि किताब को किताब बनाते यही दो निर्णय हैं।